Friday, November 12, 2010

Mid Day Meal Scheme (Hindi) हिमाचल में राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन योजना का मूल्यांकन


हिमाचल में राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन योजना का मूल्यांकन

विश्व के सबसे बडे पोषाहार कार्यक्रम राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन योजना का शुभारम्भ 15 अगस्त 1995 को भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री पी वी नरसिम्हाराव द्वारा हुआ। इस योजना से उदारीकरण तथा वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति को मानवीय स्वरूप मिला। इस योजना को विस्तृत कर सम्पूर्ण भारत मे वर्ष 2008–2009 से माध्यमिक स्तर पर भी शुरू किया गया। भारत में इस कार्यक्रम को विकसित रूप से लागू करने का श्रेय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तथा न्यायिक सक्रियता को जाता है।
योजना के पोषाहार मानक के तहत प्राथमिक स्तर पर 450 कैलोरी तथा माध्यमिक स्तर पर 700 कैलोरी प्रति विद्यार्थी प्रति दिन निर्धारित किया गया है। 24 नवम्बर 2009 को भारत सरकार द्वारा संशोधित भोजन मानक के तहत योजना में प्राथमिक स्तर पर 100 ग्राम अनाज, 20 ग्राम दाल, 50 ग्राम सब्जी तथा 5 ग्राम तेल और माध्यमिक स्तर पर 150 ग्राम अनाज, 30 ग्राम दाल, 75 ग्राम सव्जी तथा 7।5 ग्राम तेल प्रतिदिन प्रति विद्यार्थी निर्धारित किया गया है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि मध्याह्न भोजन एक सम्पूरक योजना है न कि घर के भोजन का प्रतिस्थापन।
मध्याह्न भोजन योजना के स्वास्थय तथा पोषाहार उद्देश्यों की सम्पूर्ण प्राप्ति तभी सम्भव है यदि उन्हे सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे आयरन, फॉलिक एसिड़ तथा विटामिन की भी पर्याप्त मात्रा दी जाए जिससे बच्चे कुपोषण का शिकार न हो और रक्ताल्पता जैसी बिमारी की चपेट में न आए। इस योजना के विकल्प के रूप में गरीब परिवारों को आय सहायता का सुझाव दिया जाता है, परन्तु इस विकल्प में यह सुनिश्चित नही किया जा सकता कि अभिभावक प्राप्त धन से बच्चे को सम्पूर्ण आहार देंगे या फिर अपनी कुछ निजी बुरी आदतों जैसे शराब आदि में व्यर्थ करेंगे।
मध्याह्न भोजन योजना के लिए आवश्यक अवसंरचना का प्रावधान प्रत्येक स्कूल में होना चाहिए जिसमें रसोई घर, आवश्यक बर्तन, गैस इत्यादि शामिल है। आग से सुरक्षा के निर्धारित मानकों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए, ताकि आग से होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जा सके। पर्यावरण संरक्षण हेतु ऐसे ईंधन का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे कम से कम प्रदूषण हो। स्कूल प्रशासन कोे अनाज, बर्तन, गैस इत्यादि की रखवाली का भी प्रावधान करना चाहिए।
भारत के कई भागों में विभिन्न संस्थाओं द्वारा मध्याह्न भोजन योजना पर स्वतन्त्र मूल्यांकन अथ्ययन से यह निष्कर्ष निकला है कि यह योजना विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने में सफल रही है, जिसके फलस्वरूप स्कूल में उपस्थिति दर में वृद्धि हुई है तथा स्कूल को बीच में छोडने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी हुई है। इस योजना का असर सबसे अधिक लडकियों तथा अनुसूचित जाति तथा जनजाति के बच्चों में देखने को मिला है। इस योजना से बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन और उपलब्धियों में काफी सुधार हुआ है। इस योजना का बच्चों के स्वास्थ्य पर काफी अनुकूल प्रभाव नजर आया है।
इस योजना से विभिन्न जाति, धर्म तथा समुदाय के बच्चे एक साथ बैठ कर भोजन करते है, जिससे उनके दिलों में भाईचारे की भावना पनपती है और सामाजिक समानता बढ़ती है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में कई परिवारों में पोषाहार में लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है, परन्तु स्कूल में यह योजना इस प्रकार की दकियानूसी प्रवृत्ति से बची हुई है। इस योजना से बच्चों में रेहडी इत्यादि से अस्वच्छ तथा अस्वास्थ्यकर खाद्य वस्तुओं को खरीदने की आदत में कमी हुई है।
कई लोग यह गलत धारणा बनाए बैठे है कि इस योजना से स्कूली शिक्षा प्रक्रिया में बाधा पैदा होती है और अध्यापक अथ्यापन कार्य में ध्यान देने की अपेक्षा खाना बनाने के कार्यों में समय बर्बाद करते है, परन्तु यह पूर्ण सत्य न हो कर अफवाह है। इस योजना के अन्तर्गत अध्यापकों को ऐसा कोई उत्तरदायित्व नही सौंपा गया है जिससे अध्यापन कार्यों में कोई बाधा पैदा हो। उनको मात्र निरीक्षक के रूप में अपनी भूमिका अदा करनी पड़ती है। इस योजना के कार्यान्वयन के लिए आंगनवाडी, महिला मंडल तथा अंशकालीन कार्यकर्ताओं की सेवाएं ली जाती है तथा भारत सरकार द्वारा इनको निर्धारित मानदेय दिया जाता है, परन्तु अधिकतर यह मानदेय निर्धारित समय पर नही दिया जाता।
इस योजना से सम्बन्धित दस्तावेज तथा अभिलेख कई स्कूल सही ढंग से तैयार नही करते। यदि सरकारी धन के दुरूपयोग को रोकना है तो हमें शीघ्र ही इस समस्या का समाधान करना होगा और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। इस योजना के क्रियान्वयन में जो अध्यापक सहायता कर रहा हो उसे प्रेरक के तौर पर अतिरिक्त मानदेय दिया जाना चाहिए।
इस योजना को भ्रष्टाचार से दूर रखने के लिए मीडिया तथा संसद में यह भी सुझाव दिया गया था कि तााजे भोजन के स्थान पर डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ तथा बिस्कुट इत्यादि दिए जाए, परन्तु इस कदम से भ्रष्टाचार का सिर्फ केन्द्रियकरण होगा न कि अन्त। वैसे भी ताजे गर्म भोजन का पोषकता के आधार पर कोई विकल्प नही हो सकता।
कई स्कूलों में विद्यार्थियों को हर रोज घरों से बर्तन लाने पड़ते है, जिससे उनको परेशानी होती है। कई स्कूलों में तो खाना बनाने तथा पीने के लिए स्वच्छ तथा सुरक्षित जल भी नही होता और बच्चे खाना खाने से पहले हाथ भी नही धोते। खाना बनाते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान नही दिया जाता जिससे समाचार पत्रों में कई बार ऐसी खबरें मिलती है कि फलां फलां स्कूल के इतने बच्चे खिचडी खा कर बिमार पड़ गए। बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उच्च अधिकारियों द्वारा समय समय पर इस योजना का निरीक्षण किया जाना चाहिए।
भोजन पकाने की वास्तविक लागत निर्धारित की गई दरों से काफी अधिक है। यह समस्या प्रति वर्ष बढ़ती जा रही है, क्योंकि खाद्य पदार्थों के थोक मूल्य पिछले दस वर्षों की अपेक्षा सबसे अधिक उच्च स्तर पर है और खाद्य  पदार्थों की मुद्र्रा स्फीति दर लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। जिससे मध्याह्न भोजन योजना के क्रियान्वयन में कई समस्याएं आई है।
खाद्य पदार्थों की मुद्रा स्फीति दर को ध्यान में रखते हुए भोजन पकाने की निर्धारित दर को समय पर संशोधित करने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त सरकार को इस योजन के लिए आबंटित धन राशि को उचित समय पर मुहैया करवाना चाहिए ताकि अध्यापकों को अपनी जेबों से खर्च न करना पडे। इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा भोजन पकाने की दर तथा कार्यकर्ताओं को मानदेय में दिसम्बर 2009 से लागू संशोधन प्रशंसनीय है।
इस योजन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही बनाए रखने के लिए सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत इससे सम्बन्धित जानकारी को सार्वजनिक रखना चाहिए। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सब्जियों को भी भोजन में शामिल किया जाना चाहिए ताकि आहार में विविधता लाई जा सके। इस योजना की सफलता के लिए इसमें शिक्षक अभिभावक संघ, माता शिक्षक संघ, महिला स्वयं सहायता समूह, महिला मंडल, समाज सेवी संस्था तथा ग्राम पंचायतों की सामुदायिक भागीदारी महत्त्वपूर्ण है।

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